ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 69 of 135
प्रथम महातम प्रकृति, ज्ञान रवि तहाँ प्रकासै।
दूजै ब्रह्म प्रकास कोटि सूरज सम भासै॥
तीजै पंकज- नाभि - रमा बैकुंठ निवासी।
चौथे दसरथ सुवन राम गोपुर के वासी॥
पाँचे ब्रज के गोप नंद आदिक सब गोपी।
छठवे सखी समाज करै लीला रस ओपी॥
भगवत सतयें आदरन करहिं केलि राधा रवन।
सर्वोपरि सर्वेस गुरु रसिकराइ मंगल भवन॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (45)
सबसे पहले सबसे बड़ी प्रकृति, ज्ञान का सूर्य वहीं चमकता है। दुजै ब्रह्म प्रकाश कोटि सुन सम भसै.. तिजै पंकजा-नाभि-राम वैकुण्ठवासी। चौथा दशरथ, सुवन राम निवासी गोपुर। पाँचवें, ब्रज के गोप नन्द आदि सभी गोपियाँ। छठी सखी समाज लीला रास ओपी...भागवत सत्येन केवल राधा रावण की पूजा करते हैं। परम सेवा गुरु रसिकराय मंगल भवन.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [प्रथम भाग] (45)