दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है।

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 71 of 135

दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है। निंदा अस्तुति करौ, राव क्या रंक है॥ परमारथ व्यवहार, बनौ कि ना बनौ। अंजन है मम नैन, रसिक भगवत सनौ॥ - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (47) इसमें कोई संदेह नहीं कि शरीर को सुख-दुःख का अनुभव होता है। निन्दा और स्तुति, कैसा अपमान... परोपकारी व्यवहार, चाहे बनो या न बनो। अंजन है मम नैन, रसिक भगवत सनौ.. - श्री भागवत रसिक - भागवत रसिक की वाणी, अनन्यानिश्चयतम ग्रंथ - पूर्वार्ध (47)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहिपौढे ललित लतानि तरै