पौढे ललित लतानि तरै
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 72 of 135
(राग सारंग)
पौढे ललित लतानि तरै।
सुमन-सेज सुखरासि सनेही, अधरनि अधर धरें॥
उरजनि उरज जोरि कटि सौं कटि, लपटि भुजानि भरें।
यह रसमत्त मगन मन सोये, भगवत ब्यजन करें॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.4)
(राग सारंगा) वनस्पति ललित लतानि तराई। सुमन-सेज सुखारसी सनेही, अधरनि अधर धरे...उर्जनि उरज जोरि कटि सौं कटि, लपति भुजानि भार। यः रसमत मगन मन सोय, भगवत बज्जन दो.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (5.4)