कोक कला संगीत लाल कौं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 85 of 135

(राग भैरो) कोक कला संगीत लाल कौं, सिखबति गति रस सानी। [1] रूप बयस गुन की मरजादा, पटतर कौं नहिं आनी॥ [2] सेस गिरीस मेरु मंदर हिम कंदर मैं तप ठानी। [3] ग्रीवा सींव सकल सोभा की, गीत कपोत उडानी॥ [4] - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.2) (राग भैरो) कोक कला संगीत लाल कौन, सिखाबती गति रस सानी। [1]. [3] ग्रिवा सिम्वा सकल सोभा की, गीत कपोत उदानी.. [4] - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.20.2)
पाँयन परि बिनती करैचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि