भगवत रसिक रसिक की बातें

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 91 of 135

(राग धनाश्री) तुब मुख चंद चकोर ये नैना। अति आरत अनुरागी लंपट भूल गई गति पलहु लगैना॥ अरबरात मिलिबे कौं निसिदिन मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिले ना। भगवत रसिक रसिक की बातें, रसिक बिना कोउ समुिझि सकैना॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.6) (राग धनाश्री) तुब मुख चंद चकोर ये नैना। अति अरत अनुरागी लापता भी गति गति पलाहु लगैना.. अरबरत मिलिबे कौन निसिदिन मिलि रहत मनु कबहु मिले ना? भागवत रसिक की वाणी, रसिक के बिना कोई नहीं समझ सकता.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (4.6)
भगवत रसिक मनाय लाडिलीचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि