चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 96 of 135

हैं हम रसिक अनन्य प्रिया पिय कुंज महल के बासी। [1] नई नई केलि बिलोकें छिन छिन रति विपरीत उपासी॥ [2] बीरी बसन सुगंध आरसी रुख लै करत खवासी। [3] देत प्रसाद प्रेम सों हँसि हँसि कहि कहि भगवत दासी॥ [4] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.6) हम हैं कुंज महल के रहने वाले रसिक और प्रिया पिया। [1]. [3] देत प्रसाद प्रेम पुत्र हंसि हंसि कहि कहि भगवत दासी.. [4] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (9.6)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहिचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि