जद्यपि हम सब भाँति ही
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 35 of 52
प्राननाथ व्रजनाथ जू, आरति हर नँद-नंद।
धाइ भुजा भरि राखिये, डूबत भव 'हरिचंद'॥
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (28)
प्राणनाथ व्रजनाथ जू, आरती हर नन्द-नन्द। ढाई हाथ भारी और निर्बल 'हरिचंद' भव.. - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, सबके भक्त (28)