जद्यपि हम सब भाँति ही
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 34 of 52
निठुराई मत कीजिए, नाहीं तौ प्रण जाय।
दया-समुद्र कृपायतन करुणासींव कहाय॥
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (14)
संकोच मत करो, अन्यथा तुम्हारी मृत्यु हो सकती है। दया, दया और करूणा का सागर कहां है... - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, सब वस्तुओं के भक्त (14)