जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 37 of 52

प्यारे जू तिहारी प्यारी अति ही गरब भरी। दृढ़ की हठीली ताहि आपु ही मनाइए॥ [1] नेकहू न मानें सब भाँति ही मनाय हारी। आपुहि चलिए ताहि बात बहराइए॥ [2] रिस धरि बैठि रही नेकहू न खोले बैन। ऐसी जो मानिनि तेहि काहे को रिसाइए॥ [3] 'हरीचंद' जामे माने करिए उपाय सोई। जैसे बने तेसे ताहि पग परि लाइये॥ [4] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम मालिका (53) प्रिय जू तिहारी प्रिय, अति अति गरीब। दृधा की हथेली, इसलिए मैंने इसे स्वीकार किया.. [1] न भी माना तो भी, सब प्रकार से स्वीकार किया। आइए, इस बारे में बात करते हैं.. [2] वह गुस्से में बैठ गईं और मुझसे कहा कि बैन मत खोलो। ऐसी जो मानिनी तेहि काहे को सैसी.. [3] 'हरिचंद' जामे मने करै उपाय सोई। जैसे ही आप बने, देवदूत आगे बढ़ गया.. [4] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम मलिका (53)
जद्यपि हम सब भाँति हीजद्यपि हम सब भाँति ही