जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 38 of 52

राधा जी हो वृषभानु कुमारी। कोटि कोटि ससि नख पर वारौं कीरति दृग उजियारी॥ [1] सब ब्रज की रानी सुखदानी जसुदानन्द दुलारी। ‘हरिचंद' के हिये बिराजो मोहन प्राण पियारी॥ [2] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम तरंग (1) राधा जी हो वृषभानु कुमारी। वरूण का तेज अंगुलियों पर चमकता है। [1] समस्त ब्रज की रानी, ​​सुखदानी जसुदानंद दुलारी। 'हरिचंद' के लिए बिराजो मोहन प्राण प्यारी.. [2] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम तरंग (1)
जद्यपि हम सब भाँति हीजद्यपि हम सब भाँति ही