श्री राधे मोहिं अपनौ कब करिहौ

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 45 of 52

(राग विहाग) श्री राधे मोहिं अपनौ कब करिहौ। जुगल रूप रस अमित माधुरी कब इन नैननि भरिहौ॥ [1] कब या दीन हीन निज जन पै ब्रज को वास वितरिहौ। ‘हरीचंद' कब भव बूड़त तें भुज धरि धाईं उबरिहौ॥ [2] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (1) (राग विहागा) श्रीराधे मोहिं कब करोगे? जुगल रूप रस अमित माधुरी कब मेरी आँखों में आँसू भर आये? [1] आपने कब और किस दिन अपनों के साथ ब्रज साझा किया? 'हरिचंद' तुम कब बुत बने, फिर क्यों बुत बने? [2] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (1)
जद्यपि हम सब भाँति हीजद्यपि हम सब भाँति ही