जद्यपि हम सब भाँति ही
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 51 of 52
(सवैया)
विछुरे पिय के जग सूनो भयो, अब का करिये कहि पेखिये का। [1]
सुख छांडि के दर्शन को तुम्हरे, इन तुच्छन को अब लेखिये का॥ [2]
‘हरिचन्द’ जो हीरन को ब्यवहार, इन कांचन को लै परेखिये का। [3]
जिन आंखिन में वह रूप बस्यो, उन आंखन सों अब देखिये का॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली
(सवैया) सुनो प्रिये, तुम हो विरह की पीड़ा, अब मैं क्या करूँ? [1] अब इन नन्हें-मुन्नों को सुख-रजत के दर्शन लिखो.. [2] हिरणी से ब्याह रचाने वाले 'हरिचंदा', देखो इन कंचनों को। [3] अब उन आंखों की लाली देखो जिनका रूप मन में बसता है.. [4] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली