नामी नाम न भावई

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 116 of 131

रसिक अनन्य की सभा, करमठ कृपन खिंसियांहिं। आनत नित्य विहार में, खिसलि बाहिरि जाहिं॥ - श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (213) दूसरों का एक समूह जो समर्पित, परिश्रमी हैं। अनत नित्य विहार में, खिसली बहिरि जाहिं.. - श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के मित्र (213)
प्यारी तेरे तन की सोभा बरनी न जाइनामी नाम न भावई