उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 18 of 131

(सवैया) साधन आन कोटि तप तीरथ कहा भयौ भजन उदै बिनु भांन। [1] पण्डित पढ़ पढ़ाइ सब बहके ज्यों भड़िहा भटकत निसि स्वाँन॥ [2] श्रीविहारिनदासि बिनु बनिक बनजई फूलत कृपन दै दांन। [3] रसिकन कौ रस खेत हेत तजि ये गये कूर कुरुखेत न्हांन॥ [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (62) (सवैया) साधना, वे लाखों तप और तीर्थ, भजन समझे बिना कहाँ उड़ गये। [1] पंडित के उपदेश से सब भ्रमित हो जाते हैं, भदैहा ऐसे चलते हैं जैसे अपना हो.. [2] श्री विहारिन दासी पूर्ण कृपाण बन जाती हैं। [3].
उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभअष्ट सिद्धि, नव निद्धि मुक्ति पद दें बौरावत दीख।