स्याम सब ही के जिय की जानत हैं।

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 26 of 131

स्याम सब ही के जिय की जानत हैं। करत भक्ति व्यौपार लोभ लगि, ताहि कहा कछु मानत हैं॥ अन्तरजामी सबके स्वामी, सहज प्रीति पहिचानत हैं। श्रीबिहारिजी दास निहकामनि मन की रति, श्रीमुख बरनि बखानत हैं॥ - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (107) सियाम सब कुछ जानता है. भक्ति और व्यापार करते-करते मैं लोभी हो गया, इसलिए मानता हूं... पाताल लोक में सबके स्वामी, सहज प्रेम के प्रिय। श्रीबिहारीजी दास निहाकामणि प्रेम मन के, श्रीमुख बरनि बखानत.. - श्रीबिहारीदेव, श्रीबिहारीदेवजी की वाणी, सिद्धांत श्लोक (107)
मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासीसंग न अब काहू कौ कीजै।