उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 28 of 131

(सवैया) श्रीबिहारी बिहारिनि कौ जस गावत, रीझैं देत सर्वसु स्वाँमी। [1] अमनैंक अनन्यनि कौ धन धर्म, मर्म न जानैं कर्मठ काँमी॥ [2] श्रीबिहारिनिदास विस्वास बिना, ललचात लजात लहै नँहि ताँमी। [3] और कहा वरनें कवि बापुरौ, बादि बकैं श्रम कैं मति भ्राँमी॥ [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (109) (सवैया) श्रीबिहारी बिहारिणी कोऊ जस गावत, रीझैं देत सर्वसु स्वनामि। [1] अमानैन्का अनन्यानि कौ धन धर्मा, मर्म न जनैन कर्मथ कन्मि। [2] श्री बिहारिन दास विश्वास के बिना काम में शर्म नहीं आती। [3] और कहा वरानें कवि बपुरौ, बड़ी बकैन श्रम कैन मति भ्रमि.. [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवि-सवैया (109)
संग न अब काहू कौ कीजै। उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ