प्रीति न भली भजन बिन और।

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 51 of 131

प्रीति न भली भजन बिन और। कहा कहों काहू सुख पायो एक मन धरि द्वै ठौर॥ [1] श्रीबिहारीबिहारनि के चरनकमल तजि अनत देत चित तेव महामति बौर। ‘श्रीबिहारीदास’ थोरे मन उबिट्यौ कृपा करी सिरमौर॥ [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (173) प्रीति एन भाली भजन बिन और। क्या कहूं सुख हो, एक मन हो, दो मन हो.. [1] श्रीबिहारीबिहारी के चरण कमल आनंद से परिपूर्ण हैं। 'श्री बिहारीदास' थोरे मन उबितौ कृपा करि सिरमौर.. [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी के वचन, सिद्धांत (173)
मेरो मन एक ही ठौर भलौ।कहों री जो कहिबे की होइ