भक्ति भाव विस्वास न उपजे

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 91 of 131

भक्ति भाव विस्वास न उपजे, घर घर रसिक कहाई। बिन अनन्य संसार सिंधु में, फिर फिर गोता खाईं॥ - श्री नागरी देव, श्री नागरी देव जी की वाणी (10) भक्ति और आस्था विकसित नहीं होती, घर-घर में इसे रसिक कहा जाता है। सिन्धु में परलोक नहीं, तब गोटा खैन.. - श्री नागरी देव, श्री नागरी देव जी की वाणी (10)
भाइ बिना भटकट फिरे, परमार्थ व्यौहार।राधेजू मेरौ जनम सुधारौ।