केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 11 of 77

(कवित्त) जब सों निहारौ रूप बारौ नन्द कौ दुलारौ, तब तें हमारी कुल कान बानि सटकी। [1] मन्द मन्द आवन की पट फहरावन की, ललित रसीली छबि माधुरी लकुट की॥ [2] 'लाल बलबीर' जू की बाँसुरी बजावन की, दृगन मिलावन की भृकुटी बिकट की। [3] मन्द मुसिक्यावन की झीनैं सुर गावन की, बसी छबि आन उर मोर के मुकट की॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, विप्रलब्धा (4) (कविता) जब बेटे ने अपने पिता की सुंदरता देखी और उससे प्यार किया, तो हमारा परिवार अत्याचारी बन गया। [1] भट्ठी के द्वार की मन्द-मन्द फड़फड़ाहट, मधुर गुलाबी छवि मधुरी लकुट की.. [2] 'लाल बलबीर' जू की बाँसुरी, बजावन की बाँसुरी, द्रिगन मिलावन की भौंहें बिक गईं। [3].
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं