केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 20 of 77
श्री राधा राधा रटौ, त्याग जगत की आस।
ब्रज वीथिन विचरत रहौ, कर वृन्दावन वास॥ [1]
कर वृन्दावनन वास रसिकजन संगति कीजै।
प्रेम पंथ मन ढरौ त्याग विष अमृत पीजै॥ [2]
कहैं 'लाल बलबीर' होय आनन्द अगाधा।
निश्चै करिके चित्त कहौ श्रीराधा राधा॥ [3]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (10)
त्याग जगत की आशा श्री राधा राधा रतौ। ब्रज में ध्यान करते रहो, वृन्दावन में रहो.. [1] रसिकजन के सान्निध्य में वृन्दावन में रहो। प्रेम पंथ धरौ त्याग विष अमृत पिजै.. [2] 'लाल बलबीर' कहते हैं, बड़ा आनंद है। मन बनाओ और कहो श्रीराधा राधा.. [3] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (10)