केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 23 of 77
वह रस सिंधु अगाध है, मो मति अति लघु मीन।
रसिक अनन्यन मुख सुन्यों, सोई यह लिख लीन॥
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (11)
वाह सिन्धु का रस अपार, माटी बहुत छोटी। रसिक अनन्य मुख सुन्यो, सोई लिखा ये ली.. - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल विवरण (11)