केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 30 of 77

(कवित्त) मुनिन के वृंदन के वृंद सदां वंदें तुम्हें, आनंद के कन्दै नन्दनन्दै सँग लीजिये। [1] तीन लोक जीवन के सोकन की हारनी, प्रसन्न मुख पंकज सौं चरन सरन दीजिये॥ [2] निकुंज भू विलासिनी प्रकासनी हौ ग्यान की, विजेन्द्र भान नंदनी अरज सुनि लीजिये। [3] कहत बार बार मैं तिहारे दरबार में, ‘सुलाल बलबीर’ पै कृपा कटाक्ष कीजिये॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (18) (कविता) ले मुनिन वृंदन वृंद सदन वंदेन, आनंद कंदई नंदानंदाई। [1] तीनों लोकों में जीवन के सुखों को नष्ट करने वाले पंकज, प्रसन्न मुख से मुझे अपने सौ चरणों में आश्रय दीजिए। [2] निकुंज भू विलासिनी प्रकाशनि हु ज्ञान, विजेंद्र भन नंदनि अर्ज सुनि। [3] मैं बार-बार कहता हूं तिहारे दरबार में, 'सुलाल बलबीर' पर कटाक्ष करो.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (18)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकीरति कें कन्या भई