कीरति कें कन्या भई
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 31 of 77
(कवित्त)
कीरति कें कन्या भई आये व्रज गोपी गोप,
नाचैं कूदैं गामैं दधि गोरस लुटावैं हैं। [1]
बीना लै प्रवीन राग गावत रिसीस ठाड़े,
होय हर्ष भोलानाथ डमरू बजावैं हैं॥ [2]
'लाल बलबीर' व्रजराज जी के द्वार आली,
चार मुख बारे चार वेदन सुनावैं हैं। [3]
देवता विमान चढ़े सेवन जनावैं और,
दुंदभी बजावैं गावैं फूल बरषावैं हैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)
(कविता) कीर्ति केन कन्या भाई ऐ वृज गोपी गोप, नाचैन कौदैन गमैण दधि गोरस लुटावैं है। [1]. [3] देवता विमान सेवा जानवैं और, दुंदभि बजावैं गावैं पूर्ण बरसावैं है.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (19)