बैठी कुंज माँहि महारानी ब्रजराज जू की

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 33 of 77

बैठी कुंज माँहि महारानी ब्रजराज जू की, अंग की सुगंधि भौंर भ्रमत भ्रमाने से। [1] चाह भरी दासी सुखरासी चौंर छत्र लिये, कोऊ परबीनें राग गामें मनमाने से॥ [2] 'लाल बलबीर' कर जोरत महेस सेस, सहित दिनेस उर रहत सकाने से। [3] याकी पद रेनु जाचें नारद सुरेस ठाड़े, राधे महारानी के दुआरे दरबाने से॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (21) कुंज में बैठी हुई, ब्रजराज जू की सुन्दर रानी, ​​उसके शरीर की सुगन्ध माया से गूँज रही थी। [1]. [3] याकी पद रेनू जचेन नारद सुरे ठाढ़े, राधे महारानी के दुआरे डराने से.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (21)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं