केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 34 of 77

(कवित्त) यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल, द्रवें मकरन्द फूल सुषमा दिमानी जू। [1] तिन पै मुदित मन कूकैं पिक सारी कीर, सबतें इकन्त रावरी ये राजधानी जू॥ [2] इनकी छबीली छवि ये जू सुख रासि कछू, 'लाल बलबीर' मुख चहत बखानी जू। [3] दोउ कर जोर जोर कहूँ बार बार राधे, कीजिये सुदृष्टिं मोपै वृन्दावन रानी जू॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (21) (कविता) यमुना का कुल हुआ द्रुम्बेलि झूल, द्रवेन मकरंद पूर्ण सुषमा दिमानी जू। [1] तिन पै मुदित मन कुकैन चित्र सारी कीर, सबतेन एकांत रावरि ये राजधानी जू.. [2] उनकी छवि जु सुखा रसि कछु, 'लाल बलबीर' मुख चाहत बखानि जू। [3] क्या मैं बार-बार ऊंचे स्वर से कहता हूं, दो सुधृष्टेन मोपै वृन्दावन रानी जू.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृन्दावन शतक (21)
बैठी कुंज माँहि महारानी ब्रजराज जू कीकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं