केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 38 of 77
(कवित्त)
फूले हैं पलास आस पास बन बागन में,
मधुर मधुर टेर कोकिला लगाई है। [1]
गुंजत मधुर पुंज कुंज कुंजन में,
शीतल सुगन्ध मंद पवन सुहाई है॥ [2]
‘लाल बलवीर’ बस बालम विदेश रहे,
को करे सहाय पीर मैन को सवाई है। [3]
पथिक प्रवीन प्यारे इतनी कृपा करिके,
कहियो जाय कंत सों बसंत ऋतु आई है॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक, बसन्त ऋतु (26)
(कविता) बगीचे में पलाश खिले हैं, तेरी बुलबुल ने मेरी प्यारी सी मिठाई लगाई है। [1] कुंज में मधुर ध्वनि, शीतल सुगंध, मंद पवन... [2] परदेस में 'लाल बलवीरा' मरहम बने, मेरे हृदय की वेदना दूर हो। [3] प्रिय पथिक प्रवीण, यह कहो जय कांत पुत्र, वसंत आ गया है.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, शाद्रितु शतक, वसंत (26)