केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 39 of 77
(कवित्त)
खेलत हँसत वनराज मैं विहारी प्यारी,
नाना खग मण्डली की सोभा मन भावे हैं। [1]
निरत दिखावें केते गगन उड़ावे लखि,
लाडली बुलावें तिने सीघ्र फिरि आवैं है॥ [2]
कोमल मधुर तोड़ तोड़ फल लावे सो सो,
सबै बनरानी जू की भेंट लै चढ़ावै हैं। [3]
'लाल बलबीर' उर दम्पति बढ़ावै सुख,
अति ही सजीले सुर राधा गुन गावै हैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (30)
(कविता) मैं वनराज में आनंद से खेलता हूं, मैं प्रियतमा हूं, मैं नाना खग मंडली की संगति में आनंदित हूं। [1] सदा दिखावा करो, आकाश में उड़ो, लक्खी को पुकारो प्रिय, वह शीघ्र ही लौट आया है.. [2] उसने नरम और मीठे फल तोड़े हैं, वह सभी रानियों के लिए उपहार लाया है। [3] 'लाल बलबीर', इनकी जोड़ी सुखी, अति सुन्दर धुन, राधा के गुण गाओ.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृन्दावन शतक (30)