केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 40 of 77

(कवित्त) परौ आय द्वार सुनि सुजस अपार चारु, कबहू तौ कृपा की कटाक्ष सों तकाऔगी। [1] सहचरि संग पाऊँ सेवा रुख ओर धाऊं, पद सहराऊँ तबै हेर सचु पाऔगी॥ [2] 'लाल बलबीर' दासी जानकें सदैव पासी, राखौ सुखरासी चाह चित की पुजाऔगी। [3] दोऊ कर जोरी करूँ विनती करोरी गोरी, हा हा श्रीकिसोरी ऐसें कब अपनाऔगी॥ [4] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (36) (कविता) परौ आय द्वार सुनि सुजस अपार चारु, कबहु तौ अनुग्रह के व्यंग्य पुत्र ताकौगी। [1]. [3].
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं