केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 5 of 77

(कवित्त) चाहत हैं जाकी रज संभु चतुरानन से, करें गुनगान उत्साह बास ही कौ है। [1] धर धर ध्यान हारे सामल सुजान ही कौ, स्वामिनी कृपा बिना न मिलत घरी कौ है॥ [2] करत खवासी हरिदासी हरिवंसी व्यासी, जिही जो दिवावें होय दासी भाव जी कौ है। [3] 'लाल बलबीर' नीकौ लागे प्रान पीकौ प्यारौ, वृन्दावन - चन्द वृषभानु नन्दनी कौ है॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृंदावन अष्टक (2) (कविता) मैं सनाभू चतुरानन से जाकी राज चाहता हूं, जो त्योहार की प्रशंसा करने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। [1] धर धर ध्यान हरे समल सुजान ही जहां, पत्नी की कृपा के बिना जिसे घर नहीं मिलता। [2] करत खवासी हरिदासि हरिवनस व्यासि, दिन में रहने वाली दासी कहां? [3] 'लाल बलबीर' निकौ लागे प्राण पिकौ प्यारौ, वृन्दावन - चंद वृषभानु नंदनी कौ है.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन अष्टक (2)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं