केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 53 of 77
अमल अमोल है अनूपम हैं रेनु याकी,
सिद्धि कामना की देन वारी है अनन्द की। [1]
जाकौं अंग लाय लाय सार वस्तु पाय पाय,
गाय गाय बानी सुधा सानी प्रेम फन्द की॥ [2]
'लाल बलबीर' याकी महिमा कहाँ लौं कहूँ ,
और लोक लोक की बड़ाई सबै मन्द की। [3]
फन्द की हरैया है करैया आनन्द सदां ,
लीजिये विलोकि छवि वृन्दावन-चन्द की॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (63)
कर्म अनमोल है, रेनू याकी अद्वितीय है, सफलता इच्छा का उपहार है, खुशी बहुत अलग है। [1] वास्तु के सिर धरै कौन देह, गे बानी सुधा सानी प्रेम पंड की.. [2] 'लाल बलाबीर' की महिमा कैसे कहूं, जग की महिमा सब धूमिल। [3] फैन की हरैया है करैया आनंद सदन, वृन्दावन - चंद्रमा की विलो छवि ले लो.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (63)