केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 58 of 77

(सवैया) श्री वृषभानु सुता पद पंकज मेरी, सदां यह जीवन मूर है। [1] याही के नाम सो ध्यान रहै, नित जाकें रटे जग कंटक दूर हैं॥ [2] श्रीवनराज निवास दियो, जिन और दियो सुख हू भरपूर है। [3] याकौं बिसार जो औरै भजौं, 'बलबीर' जू जानिये तौ मुख धूर है॥ [4] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद,श्रीराधा शतक (74) (सवैया) श्री वृषभानु सुता पाद पंकज मैरी, हाउस यह जीवन मर चुका है। [1] इस स्थान का नाम स्मरण करो, नित जग से दूर हो जाओ.. [2] दीपकों में श्रीवनराज का वास है, जहां अन्य दीपक प्रसन्न होते हैं, वह भरपुर है। [3] यकौं बिसर जो अराई भजौं, 'बलबीर' जो जानि तौ मुख धुर है.. [4] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, श्रीराधा शतक (74)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं