केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 59 of 77
(कवित्त)
वृन्दावनवारी प्यारी अरज हमारी ये ही,
दया की निधान एती बिनै कान कीजिये। [1]
और जग जाल के न ख्याल में बिहाल करौ,
उर प्रतिपाल नेह कुंज में ढरीजिये॥ [2]
‘लाल बलबीर' दासी आपनी खवासी जान,
कछू सुखरासी जू टहल माहिं लीजिये। [3]
चरन सरोजन सों नेह रहै आठौं जाम,
और सों न काम बास वृन्दावन दीजिये। [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (77)
(कविता) वृन्दावनवारी प्रिय विनती यही विनती है, दया बिन सुनो। [1] और जग को जल के विचार में मत भटकाओ, पल-पल कुंज में बसाओ.. [2] 'लाल बलबीर' दासी, प्यारी प्यारी, सुख के सागर में सैर करो। [3] चरण सरोजन, मैं सुखी नहीं, और कुछ नहीं कर रहा, बस मुझे वृन्दावन दे दो। [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शताब्दी (77)