केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं

Braj Binod — श्री लाल बलबीर

Verse 60 of 77

(कवित्त) चंपक बरन मृगलोचनी सलोनी राधे, और की न आस मेरें तुही है उपास री। [1] मेटौ जग त्रास कीजै कुमति को नास, मोहि जान निज दास करौ हिये मैं प्रकास री॥ [2] 'लाल बलबीर' जन धीरज-धरैनी मन, तोसी तौ तुही हैं और काकी करौं आस री। [3] पूरी कर आस मेरी एहो, सुखरास मोकौं, कृपा करि दीजै सदाँ वृन्दावन बास री॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (86) (कविता) चैनपाक लेकिन मृगलोचनी सलोनी राधे, और की ना अस मेरे तुही है उपास री। [1] यदि संसार को कष्ट होगा तो मैं देवी को नष्ट कर दूंगा और तुम्हें अपना दास बना लूंगा। [2] 'लाल बलबीर', तुम मेरे मन को धैर्य दोगे, तुम भी मेरे लिए ऐसा ही करोगे और मेरी मौसी भी ऐसा ही करोगी। [3] मेरी इच्छा पूरी करो, मुझे वृन्दावन का घर दो, कृपा करो.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (86)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौंकेकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं