केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 68 of 77
(कवित्त)
चाहे कीर-कोकिला कपोत कर सारस हू,
चाहे मुखचन्द्र की चकोरी ले बनाईये। [1]
चाहे कर-लता-द्रुम ,फूल-फल-पल्लव ते,
मधुकर चाहे नेक दया दृष्टि लाईये॥ [2]
लालबलवीर दासी दीन है दया की राशि,
कीजिये जरूर यहाँ जोहि मन भाईये। [3]
पर जैसे बने तैसे करूणानिधान स्वामिनी जू,
हाहा हे ! किशोरी मोहे वृंदावन बसाईये॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
(कविता) या तो पक्षी को सारस बनाओ, या बुलबुल बनाओ, या चाँद का मुँह बनाओ। [1] चाहे कारा-लता-ढोल हो, फूला-फला-पल्लव ते हो, मधुकर हो या महान दया का दर्शन हो.. [2] लाला बलवीर दासी का दिन दयालुता का प्रतीक है, यहां जो चाहो करो। [3] परन्तु जो कुछ भी हुआ, करुणानिधान स्वामिनी जू, हा हा हे! किशोरी मोहे वृन्दावन बसै.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोदा