केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
Braj Binod — श्री लाल बलबीर
Verse 70 of 77
काके द्वारा जाऊँ काकूँ बिनती सुनाऊँ वृथां,
जनम गमाऊँ क्यौं कराऊँ जग हासनी। [1]
तेरो ही कहाऊँ तोय छोड़ कहाँ अन्त जाऊँ,
सीस पद नाऊँ तू है सदां सुख रासनी॥ [2]
'लाल बलबीर' नेति नेति गुनगाऊँ मन,
मानी निधि पाऊँ तू पूजैया जन आसनी। [3]
पातक अगाधा कीये दीन सुख साधा तुही,
हरो मेरी बाधा राधा वृन्दावन बासनी॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
जब भी चाचा के दरवाज़े पर फरियाद सुनता हूँ तो वही पुरानी फरियाद सुनती है, क्या करूँ कि मेरा जन्म सुखमय हो। [1] जो कुछ मैं कहूं वह तुम्हारा ही है, अंत कहां छोड़ूं, यह नवां श्लोक है, घर में सुख का सार तुम हो.. [2] 'लाल बलबीर' नेति नेति गुनगौं मन, मणि निधि पौं तू पूजइया जन असनि। [3] अपार खुशियों के दिन खुशियाँ सदा साथ हैं, हरो मेरी बढ़ा राधा वृन्दावन बासनी.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोदा