कीच लगी ब्रज खिरक की

Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे

Verse 109 of 229

को कवि वर्णन कर सके, ब्रज की रज कौ मूल। जाकी कण-कण में मिली, युगल चरण की धूल॥ - ब्रज के दोहे ब्रज की रज की उत्पत्ति का वर्णन कौन कवि कर सकता है? मन का हर कोना युगल चरण की धूल से मिलता है। -ब्रज के दोहे
कीच लगी ब्रज खिरक कीकीच लगी ब्रज खिरक की