राग मुक्त मन शुद्ध ह्वै विगत ज्ञान अज्ञान
Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे
Verse 159 of 229
राग मुक्त मन शुद्ध ह्वै, विगत ज्ञान अज्ञान।
प्रेमी के सुख में सुखी, यह स्वभाव अब आन॥
- ब्रज के दोहे
मोह से मुक्त हुआ मन शुद्ध हो जाता है और मन अज्ञान से मुक्त हो जाता है। प्रेमी का सुख, नर का सुख, यह स्वभाव अब अज्ञात.. -ब्रज के दोहे