कीच लगी ब्रज खिरक की

Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे

Verse 58 of 229

गौर स्याम तन मन रंगे, प्रेम स्वाद रस सार। निकसत नहिं तिहि ऐन ते, अटके सरस बिहार॥ - ब्रज के दोहे गौर स्याम तन-मन सीमा, प्रेम रस सर। इस छोर से कोई निकास नहीं, ये है हरा-भरा बिहार.. -ब्रज के दोहे
कीच लगी ब्रज खिरक कीकीच लगी ब्रज खिरक की