कीच लगी ब्रज खिरक की
Braj Ke Dohe — ब्रज के दोहे
Verse 85 of 229
जिन मोरनके पंख हरि, राखत अपने शीश।
तिनके भागनकी सखी, कौन करिसकै रीश॥
- ब्रज के दोहे
मोर के पंख हरे और सिर झुका हुआ होता है। तेरी बहन की सखी, कौन सह सके ऋषभ... - ये ब्रज के दोहे हैं सखी! जिन मूर्खों के पंखों को श्रीहरि ने अपने मस्तक पर रख लिया है, उन मूर्खों के भाग्य की तुलना कौन कर सकता है?