ऐसो आनन्द सखी आज लों न देखो कबूँ

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 6 of 40

(राग ध्रुपद) ऐसो आनन्द सखी आज लों न देखो कबूँ, आप ही झूलनिहार आप ही झुलावें। [1] वरषत घन गरजि घोर बोलत पिक नचत मोर, चपला चमकि चहूँ ओर दम्पति हरषावें॥ [2] भीजि रहे चीर बहे कुसुम रंग अंग अंग, तापै दोउ एक संग मिलि मलार गावें। [3] नारायण पीय प्यारी सावन सुख लेत सखी, गौर श्याम बदन रती मदन को लजावें॥ [4] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (16) (राग ध्रुपद) ऐसो आनंद सखी, आज उधार न ढूंढो कबुन, एपी ही झुलनिहार एपी ही झुलवन। [1] भारी बारिश हो रही है, मोर नाच रहा है, चाहे मुझे एक युवा लड़की चाहिए या हर्षवन का एक जोड़ा... [2] मैं हमेशा अलग-अलग तरीकों से बहते फूलों के रंगों के साथ रहता हूं, तपै दो एक संग मिलि मार ग्वेन। [3] नारायण पिया प्यारी सावन सुखी लेत सखी, गौर श्याम बदन रति मदन को लाजावें.. [4] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (16)
आवौ सखी मिलि मंगल गावौप्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै