नवल कुंज नवनागरी, नव नागर नंदनन्द
Braj Vilasa — श्री ब्रजवासीदास
Verse 11 of 21
नारायण वृन्दाविपिन, निशिदिन रहत वसन्त।
पिय प्यारी मिलि मुदित मन, क्रीड़ा करत अनन्त॥
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वसंत लीला (1)
नारायण वृंदाविपिन, निशिदिन रहत वसंत। प्रिय प्रियतम, प्रसन्न मन, अनंत लीला.. - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वसंत लीला (1)