कुँवरि किसोरी नवल पिय करत परस्पर हेत

Brajanidhi Granthavali — श्री ब्रज निधि जी

Verse 1 of 12

(कवित्त) आनंद अगाधा लहै साधा सुख सेवत ही, करत अराधा असरन के सरन हैं। [1] प्रीतम की प्यारी सुकुवारी सब-गुन-निधि, जाको नाम लेत मुद-मंगल-करन हैं॥ [2] करत ही ध्यान उर हरत कलेस सब, चरन सरोज दुख-दंद के दरन हैं। [3] आसरो अनन्य गहिए रे मन मेरे सदा, राधा महारानी सब बाधा की हरन हैं॥ [4] - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (69) (कविता) ख़ुशी अपार है, ख़ुशी हमेशा काम आती है, दिल पर इसका मनमोहक असर होता है। [1] प्रियतम प्रिय सुकुवारी सब-गुण-निधि, जाको नाम लेट मुद-मंगला-करण है.. [2] करत ही ध्यान उर हरत कलेस सब, चरण सरोज प्रिय दुख दण्ड। [3] मेरे हृदय में और भी आँसू हैं, राधा महारानी सर्व मंगल विनाशक हैं.. [4] - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (69)
कुँवरि किसोरी नवल पिय करत परस्पर हेत