नित हित चित के माहि, लाल किसोरी रटतु हैं
Brajanidhi Granthavali — श्री ब्रज निधि जी
Verse 10 of 12
राधे सुख को सार, निरखत पिय गोहन रहैं।
हिय बिच किएँ जुहार, अष्ट पहर तुमकों चहैं॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (28)
राधे सुख का सार है, गोहन अवर्णनीय पीनेवाला है। अरे कुतिया, तुझे कैसा जुहार, अष्ट पहर चाहिए? -श्रीब्रजनिधि जी,ब्रजनिधि ग्रंथावली,प्रीति लता (28)