अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 10 of 35
हमारी बाँह गही वृन्दावन।
राख्यो अपनी सीतल छइयाँ, जग दुख घाम तज्यौ तन॥[1]
मो मैं कछू क़ृपाबल नाहीं, हौं जानौं अपनें मन।
नागरीदास नांव हित सौं करि, कृपा करायो धन-धन॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (119)
वृन्दावन हमारी बाँहों में। अपनी शीतल छाया बनाये रखो, संसार के दुःख दर्द छोड़ो..[1] मैं कुछ भी करने में सक्षम नहीं हूं, मैं अपने मन की बात जानता हूं। नागरीदास सबका कल्याण करें, हमें धन-धान्य प्रदान करें.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (119)