अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 11 of 35
हम तो बरसाने के बासी।
गहवर गिरि जहाँ खोरसांकरी, ललित ठौर सुखरासी॥ [1]
कुण्ड भरे जल बन उपवन छबि, कुंजकुटी अनयासी।
कुंवरिलली की देत दुहाई, सब सुख शैलनिवासी॥ [2]
नर-नारी पशु पंछी इहिं ठां, लीला ललित उपासी।
फ़िरत लाड़िली कै संग निति, नटनागर करत खवासी॥ [3]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (107)
हम तो बस बारिश का इंतजार कर रहे हैं.' गहवर गिरि जहां खोरासंकारी, ललित ठौर सुखरासी। [1] तालाब भरे जल पार्क छवि, कुंजाकुटी अनायासी। कुँवरिलाली की पुकार, सब सुख समंदर में। [2] नारे, नारी पशु-पक्षी यहीं हैं, लीला ललित उपासी। नीति से फिर झगड़ते क्यों नहीं, नटनागर करता है खवासी.. [3] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (107)