अब तो कहिबे की न रही
Chhutak Pada —
Verse 12 of 35
जो सुख लेत सदा व्रजवासी।
सो सुख स्वपनेहुँ नहिं पावत जे वैकुण्ठ निवासी॥ [1]
ह्वां घर-घर ह्वै रह्यौ खिलौना जगत कहत जाकों अविनासी।
नागरीदास विशव तैं न्यारी लगि गई लूट हाथ सुखरासी॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (144)
सुख भोगने वाला सदैव व्रजवासी होता है। तो ख़ुशी कोई सपना नहीं, मैं वैकुण्ठ का वासी हूँ। [1] जब मैं घर-घर में रहता हूँ, तो खिलौना संसार कहता है, यह अविनाशी है। नागरीदास, जग न्यारा, सुख गया खोय.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी के वचन, चुटक पद (144) जो दिव्य सुख ब्रजवासियों को सदैव प्राप्त होता है, वह वैकुंठवासियों को स्वप्न में भी नहीं मिलता। [1]