नित्त सरद नित्त तीज है

Chhutak Pada —

Verse 21 of 35

एक अखंडित एकरस, निरवधि रति जो होइ। मिलत मिलत विरह न घटै, प्रेम कहते हैं सोइ॥ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4) वह एक सतत, नीरस, अबाधित रात थी। मिलना, मिलना और बिछड़ना नहीं होता, प्रेम कहे सोई.. - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, विशेष पोस्ट और मित्र (4)
नित्त सरद नित्त तीज हैनित्त सरद नित्त तीज है