अब तो कहिबे की न रही

Chhutak Pada —

Verse 4 of 35

बहुरि परे वा दिश को पांव। परम मनोहर जमुना तट परि, जा दिशि मेरो गांव॥ [1] स्वामी तहाँ हमारे मोहन, स्वामिनी राधा नांव। नागर ह्वाँ बहु चरन धारि, उहां पहुँचि पंगु ह्वै जांव॥ [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (102) बहुरि पारे या पैर दिशा की ओर। परम सुन्दर जमुना, वह देवदूत, मेरी ओर आओ.. [1] प्रभु हमारे मोहन, स्वामिनी राधा नानाव। नगर हंस के कई पैर होते हैं, वहां पहुंचते ही पिंगू जैसा महसूस होता है.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (102)
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