अब तो कहिबे की न रही

Chhutak Pada —

Verse 5 of 35

ब्रज के परम सनेही लोग। गारी दैं हँंसि मिलत गहबरे, अंतर प्रेम संयोग॥ [1] प्रेम रूप रस दंपति लीला, यह तिनकौ नित भोग। ‘नागरीदास’ सदा आनंदी, सुपनें हूँ नहिं सोक॥ [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (2) ब्रज के लोग बहुत प्यारे हैं। गारी दैण हन्नासी मिलत गहबरे, अंतर प्रेम संयोग..[1] प्रेम का रूप, दान का रस, लीला, यह तिनकौ नीता भोग। 'नागरीदास' सदैव प्रसन्न रहते हैं, उनकी नींद कभी नहीं टूटती.. [2] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी के वचन, छुटक पद (2)
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