अब तो कहिबे की न रही

Chhutak Pada —

Verse 6 of 35

देह धरे को अब फल पायो। बीते बहुत दिवस असमंजस, माया नाच नचायो॥ [1] थोहरबन तैं मोहि काढ़ि थिर, वृन्दाविपुन बसायो। कौन कृपा अनयास भई हौं, निज मन हेरि हिरायो॥ [2] निसदिन पहर घरी छिन छिन पल, नित आनन्द रहै सरसायो। नागरिदास दास ह्वै कै जो, यहाँ न आयो सो पछितायो॥ [3] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (121) अब अपने शरीर का फल भोगो। बहुत देर तक असमंजस की स्थिति रही, माया नाचती रही... [1] थोहराबन तै मोहि कढै थिर, वृन्दाविपुन बसयो। मेरे भाई की कृपा के कारण, मेरे हृदय का रोम-रोम आनंद से भर गया है.. [2] मेरे जीवन का हर दिन, हर पल खुशी है, हर दिन खुशी है, सरस्यो। कौन हैं नागरीदास दास, यहां नहीं आओगे तो चले जाओगे.. [3] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (121)
अब तो कहिबे की न रहीअब तो कहिबे की न रही